Thursday, February 26, 2009

Hamid Yazdani

मेरी एल्बम में ठहरे हुए मौसमों को ख़बर हो गयी
सब्ज़ शाखों में दुबका हुआ वक्त खामोश है
क्या हुआ ?
क्या बहार आ गयी ?
खिल उठा ज़ख्म-ऐ-ख्वाब-ऐ-हुनर
फिर दहकने लगी है नज़र ।

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