Thursday, January 19, 2012

चिकनी चमेली गीत टिपण्णी

Bichhu mere naina, badi zehereeli aankh maare
Kamsin kamariya saali ik thumke se lakh maare


गीत के प्रारंभ में सुंदरी अहिंसक तरीक़े से लोगों को मारने की अपनी क्षमता पर प्रकाश डालती है. उसकी आँख की उपमा बिच्छू से दी गई है और ठुमके में गुरु गोविन्द सिंह के आह्वान को लगभग पूरा करने की कोशिश की गई है ...

Note hazaaro'n ke, khulla chhutta karaane aayi
Husn ki teelli se beedi-chillam jalaane aayi


तदुपरांत अपने पास हज़ारों के नोट होने के बावजूद छुट्टे और बीड़ी-चिलम में दिलचस्पी रखने वाली इस सुंदरी का rooted to the soil चरित्र उभर कर आता है ...

Aaayi ! chikni chameli chhup ke akeli pawwa (quarter) chadha ke aayi


स्वयं को चिकनी चमेली से ता'आर्रुफ़ कराने वाली यह सुंदरी मदिरापान छुप के करती है ... यह भारतीय समाज में स्त्रियों के मदिरापान को हेय दृष्टि से देखने की वजह से उनकी छुप के मदिरापान करने की विवशता को भी दर्शाता है ... ये भी मुमकिन है कि ये सुंदरी अपनी मदिरा को किसी और के साथ बांटना नहीं चाहती ... बहरहाल ... इस दौर में जब भारतीय क्रिकेटरों को चिकने हाथों (butter fingered) वाला कहा जाता है , इस सुंदरी के आपादमस्तक (नख-शिख) चिकने होने में भी अमूल मक्खन का योगदान होने की सम्भावना से इनकार नहीं कर सकते ... इसका एक तात्पर्य ये भी है कि सुंदरी ने मदिरापान कर के अपनी मादकता बढ़ाने का प्रयास किया है... वस्तुतः उसे इसकी ज़रुरत नहीं होनी चाहिए ... अगर ऐसा है तो यह उसके आत्मविश्वास की कमी दर्शाता है... गौरतलब है कि अपने पूर्व (शीला ) अवतार में ये सुंदरी आत्ममुग्धता की शिकार थी... ख़ैर आगे चलते हैं ...

Jungle mein aaj mangal karungi main
Bhookhe sheron se khelungi main
Makkhan jaisi hatheli pe jalte angaare le lungi main
Haaye! gehre paani ki machhli hoon Raja
Ghaat Ghaat dariya mein ghoomi hoon main
Teri nazro ki leharo'n se haar ke aaj doobi hoon main

Hoye jaanleva jalwa hai
Dekhne mein halwa hai
Jaanleva jalwa hai
Dekhne mein halwa hai
Pyaar se paros doongi toot le zaraa

Yeh toh trailer hai poori fillam dikhane aayi


जंगल में मंगल करना और भूखे शेरों से खेलने की बात सुंदरी के playful चरित्र पर प्रकाश डालता है... 'जानलेवा जलवा' और 'देखने में हलवा' काफ़िये का अच्छा ख़याल रखते हुए सुंदरी पूरी चलचित्र दिखने का वादा भी करती है... यह हमारे कुछ सिनेमा-प्रेमी दोस्तों के लिए खुशख़बरी है...

Banjar basti mein aayi hai masti
Aisa namkeen chehra tera
Meri neeyat pe chadhke chhoote na hai rang gehra tera
Joban ye mera kenchi hai raja
Saare pardo ko kaatungi main
Shaame meri akeli hai aaja sang tere baatungi main
Haaye! baaton mein ishaara hai
Jisme khel saara hai
Baaton mein ishaara hai
Jisme khel saara hai
Tod ke tijoriyon ko loot le zara
Choom ke zakhmo pe thoda malham lagaane aayi


अपने चेहरे के नमक से बंजर बस्ती में मस्ती लाने का दावा करने वाली ये सुंदरी आशंकित है कि इसकी नीयत पे चढ़ने वाले का गहरा रंग इस पर न गिर/टूट/चढ़ जाए ... कैंची जसी जोबन (यौवन का तद्भव ) से तमाम पर्दों को काटने की क्षमता रखने वाली यह युवती यक़ीनन बहुत प्रतिशील विचारधारा का अनुसरण करती है जिसमें पर्दा और हिजाब का विरोध करना सर्वथा उचित है ...अगले वाक्य में अपनी अकेली शाम की बात से उसने 'भरे शहरों में तन्हाई बहुत है' की पुष्टी की है ... शामों को बांटने की बात कर के सुंदरी ने pare & share की अपनी मंशा ज़ाहिर की है... इशारे से सुंदरी तिजोरियों को तोड़ने और लूटने की लोगों की इच्छा बढ़ाती है ... ऐसी सुंदरियों के आग्रह से हमारे समाज में क़ानून-व्यवस्था के लिए संकट उत्पन्न हो गया है ... फिर चूम कर ज़ख्मों पर मलहम लगाने की बात करती है... इसके दो तात्पर्य हैं ... १. ये हमारे समाज में hygiene की उपेक्षा करने की प्रवृत्ति दर्शाता है...२. उपचार की ये विधि अगर सफल होती है तो ये हमारे देश के pharmaceutical उद्योग के लिए भारी खतरा साबित हो सकती है .

Aaayi ! chikni chameli chhup ke akeli pawwa chadha ke aayi....


अंततः सुंदरी ख़ुद के चिकने होने और पौव्वा के सहारे मादकता अधिकाय की स्थिति की पुनारोक्ति करती है ...

संध्या सुन्दरी - निराला

संध्या सुन्दरी

दिवसावसान का समय -
मेघमय आसमान से उतर रही है
वह संध्या-सुन्दरी, परी सी,
धीरे, धीरे, धीरे,
तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास,
मधुर-मधुर हैं दोनों उसके अधर,
किंतु ज़रा गंभीर, नहीं है उसमें हास-विलास।
हँसता है तो केवल तारा एक -
गुँथा हुआ उन घुँघराले काले-काले बालों से,
हृदय राज्य की रानी का वह करता है अभिषेक।
अलसता की-सी लता,
किंतु कोमलता की वह कली,
सखी-नीरवता के कंधे पर डाले बाँह,
छाँह सी अम्बर-पथ से चली।
नहीं बजती उसके हाथ में कोई वीणा,
नहीं होता कोई अनुराग-राग-आलाप,
नूपुरों में भी रुन-झुन रुन-झुन नहीं,
सिर्फ़ एक अव्यक्त शब्द-सा 'चुप चुप चुप'
है गूँज रहा सब कहीं -
व्योम मंडल में, जगतीजल में -
सोती शान्त सरोवर पर उस अमल कमलिनी-दल में -
सौंदर्य-गर्विता-सरिता के अति विस्तृत वक्षस्थल में -
धीर-वीर गम्भीर शिखर पर हिमगिरि-अटल-अचल में -
उत्ताल तरंगाघात-प्रलय घनगर्जन-जलधि-प्रबल में -
क्षिति में जल में नभ में अनिल-अनल में -
सिर्फ़ एक अव्यक्त शब्द-सा 'चुप चुप चुप'
है गूँज रहा सब कहीं -
और क्या है? कुछ नहीं।
मदिरा की वह नदी बहाती आती,
थके हुए जीवों को वह सस्नेह,
प्याला एक पिलाती।
सुलाती उन्हें अंक पर अपने,
दिखलाती फिर विस्मृति के वह अगणित मीठे सपने।
अर्द्धरात्री की निश्चलता में हो जाती जब लीन,
कवि का बढ़ जाता अनुराग,
विरहाकुल कमनीय कंठ से,
आप निकल पड़ता तब एक विहाग!

- निराला

Thursday, January 5, 2012

Monday, November 14, 2011

मेरा चेहरा

कल शब
तन्हाई की आँधियों से
लौ कंपकंपा रही थी
तुम्हारी याद ने इसके गिर्द
अपने हाथ का घेरा बना
इसे बुझने न दिया ...

~Ashwini

Friday, October 28, 2011

Rahi Masoom Raza to his daughter Mariyam

हम तो हैं कंगाल
हमारे पास तो कोई चीज़ नहीं
कुछ सपने हैं
आधे-पूरे
कुछ यादें हैं
उजली-मैली
जाते-जाते
आधे-पूरे सारे सपने
उजली-मैली सारी यादें
हम मरियम को दे जाएंगे

गंगोली के कच्चे घर में उगने वाला सूरज
आठ मुहर्रम की मजलिस का अफसुर्दा-अफसुर्दा हलवा
आँगन वाले नीम के ऊपर

धूप का एक शनासा टुकड़ा
गंगा तट पर
चुप-चुप बैठा
जाना-पहचाना इक लम्हा
बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई
अहमद जान के टेबल की चंचल पुरवाई

खाँ साहिब की ठुमरी की कातिल अंगड़ाई
रैन अँधेरी
डर लागे रे
मेरी भवाली की रातों की ख़ौफ़ भारी लरज़ाँ तन्हाई
छोटी दव्वा के घर की वो छोटी सी सौंधी अँगनाई
अम्मा जैसा घर का आँगन
अब्बा जैसे मीठे कमरे
दव्वा जैसी गोरी सुबहें
माई जैसी काली रातें
सब्ज़ परी हो
या शहज़ादा
सबकी कहानी दिल से छोटी
फड़के
घर में आते-आते
हर लम्हे की बोटी-बोटी
मेरे कमरे में नय्यर पर हँसने का वो पहला दौरा
लम्हों से लम्हों की क़ुरबत
लम्हों से लम्हों की दूरी
गंगोली की
गंगा तट की
ग़ाज़ी पुर की हर मजबूरी
मेरे दिल में नाच रही है
जिन-जिन यादों की कस्तूरी
धुंधली गहरी
आधी-पूरी
उजली-मैली सारी यादें
मरियम की हैं
जाते-जाते
हम अपनी ये सारी यादें
मरियम ही को दे जाएँगे

अच्छे दिनों के सारे सपने
मरियम के हैं
जाते-जाते
मरियम ही को दे जाएँगे

मरियम बेटी
तेरी याद की दीवारों पर
पप्पा की परछाई तो कल मैली होगी
लेकिन धूप
तिरी आँखों के
इस आँगन में फैली होगी

Monday, October 10, 2011

Political stability gone for a toss

This has been one heck of a year so far. Across the globe we have had popular uprisings against some regimes in power since the time I came to understand my alphabets. Arab spring is all too emphasized. But Eurozone has also been witnessing instability, which is more in the nature of economic but political repercussions of which can not and should not be ruled out. Fingers crossed here. South Asia has also had its share of political instability. Pakistan has well and truly become a failed state. Zardari, Gilani & Co has no control over what's happening in their a-blast-a-day country. Nepal has got yet another new PM. Indian UPA Government has compromised on Indian democratic traditions to ensure it continues in power. Sri Lanka and Bhutan have been pretty stable. But of course, there is no democracy in the two countries. Sri Lanka is officially a democratic regime while Bhutan has a kingdom. But interestingly, Bhutan is much more democratic than Sri Lanka. The big question to ponder is: Is this a desirable situation? Most of the countries where regimes have been overthrown are now mired in anarchy. International help (read interference) has not helped either. It's upto the citizens of these countries to unite and give themselves a sane leadership sans any help from the international community (the USA etc.)

~Ashwini

Sunday, October 9, 2011

Suicide

Very often one comes across cases of people committing suicide because life has not treated them well enough. One news item suggests, there is a spurt in such cases of late, at least in Delhi. This is true in other parts of India also. However, in a bizarre case a couple committed suicide in Goa because they were content from life. It is disturbing for two reasons: 1. Everybody wants to be content with life. But does it lead to repulsion from life? & 2. Is early-30s right time to be content with life?

I believe that suicide is not a solution; it's plain escapism. I think that जीवन मृत्यु से हमेशा श्रेष्ठतर है . And as Javed Akhtar puts it
ख़ुदकुशी क्या दुखों का हल बनती
मौत के अपने सौ झमेले थे .

~Ashwini